
इसमें कोई शक नहीं की ओशो एक बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति थे ! लेकिन इसके साथ हम यह भी कहेंगे कि वह एक बहुत ही चरित्रहीन व्यक्ति थे ! और एक बुद्धिमान व्यक्ति जब यह जान जाता है कि मैं एक चरित्रहीन व्यक्ति हूं तो वह अपने बुद्धि के बल पर चरित्रहीनता को ही अध्यात्म बना देता है ! चरित्रहीनता को ही फिलासफी में शामिल कर लेता है और इसी बात को ध्यान में रखते हुए ओशो क्या करते हैं, आप उनका कोई भी वक्तव्य सुन लीजिए उनके वक्तव्य में सिर्फ आपको इस बात का एहसास होगा कि, वह एक व्यक्ति बहुत ही बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए वक्तव्य किया है ,उनके वक्तव्य में ऐसी स्थिति नहीं दिखेगी जहां पर बुद्धि का इस्तेमाल नहीं हुआ हो, उनके वक्तव्य में बहुत सारे किताबों के रेफरेंस मिल जाएंगे जिसके आधार पर वह अपना वक्तव्य करते हुए पाए जाते हैं ! ओशो एक बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति थे ,और उन्हें इस बात का बहुत ही अच्छे से आभास था कि भारत मूर्खों का देश है , और मूर्ख के सामने चरित्रहीनता को परोसाना हो आध्यात्मिक साया पहनाकर तो कैसे यह संभव होगा ,इसको वह बखूबी समझते हुए जानते थे कि कैसे इस बात को मंच पर आकर कहना चाहिए ! वह व्यक्ति इतना समझदार था, कि उसे पता था ,कि भारत में लोग सबसे पहले पैकेट का जो सुंदरता है उसको देखते हैं ! इसका मतलब गेट अप …जैसे कोई व्यक्ति कह रहा है , उसके कहने के तरीके की जो सुंदरता है ,वह बहुत ही महत्वपूर्ण होती है ,मूर्ख के सामने किसी बात को लेकर …जैसे कोई अगर छोटा बच्चा ऊंचे स्तर की ही बात कर देता हो, तो भारत के मूर्ख उस बात को स्वीकार नहीं करेंगे ,इसी बात को ध्यान में रखते हुए आप देखेंगे …ओशो ने अपने वक्तव्य करने की जो कला है उसे कला को बहुत ही अच्छे से सजाया है …और सजाने की कला पर उन्होंने काम किया है !और उस पर काम करते हुए आप पाएंगे कि ओशो बहुत ही धीरे बोलते थे ,धीरे के साथ-साथ उन्होंने हर बात को कहां पर जाकर रुकना है… इसको बहुत ही बारीकी से इस्तेमाल किया है …कहां पर थोड़ा ठहराव देना है ..इसको वे बहुत अच्छी तरह से समझते थे ! क्योंकि भारत के जो मूर्ख है, वह यह समझते हैं कि कोई भी अच्छा पढ़ा लिखा व्यक्ति अगर धीरे बात करता है… तो बहुत ही ऊंचे स्तर की ही बात कर रहा होगा ! ऐसी उनकी मानसिकता होती है ,क्योंकि उनका खुद का तर्क बहुत छोटा होता है ! वह तार्किक होकर उसकी बातों को काटने की क्षमता तो रखते नहीं हैं ….बस उसके गेट अप के आधार पर उसके साथ बह जाते हैं ,स्वीकार कर लेते हैं, और दूसरी बात यह भी है कि इस समाज में चरित्रहीन लोगों की जो संख्या है, बहुत ही उंचे लेवल की है ,आज आप देख रहे होंगे न्यू जनरेशन ओशो से बहुत ज्यादा प्रभावित होकर उनको फॉलो करने लगी है …. क्यों क्योंकि जो न्यू जनरेशन है….. उन्हें खुलापन चाहिए उन्हें एक चरित्रहीनता का खुलापन चाहिए …एक चरित्रहीन होकर कैसे जिवना के साथ जिया जा सकता है …इसके लिए उन्हें बहुत अच्छे से ओशो के वक्तव्य से सिख मिलता है ,कुल मिलाकर मेरा कहना है कि ओशो के जो वक्तव्य है, एक जानवर के जैसा समाज के निर्माण में भूमिका है , हमें कह सकते हैं भूमिका निभा रहे है या फिर भूमिका निभाएगा ,निभा रहा है , चरित्रहीनता को ढीठता के साथ स्वीकार कर लोगों के सामने आ रहे हैं ! यह सब कुछ ओशो के वक्तव्य से देखने को मिलता है ,मैं यह कह सकता हूं कि ओशो के अंदर आध्यात्मिक जो ऊंचाई है ना के बराबर थी ! या फिर यह भी कह सकते हैं कि एक बुद्धिमान व्यक्ति अपना फिलासफी के क्षेत्र में स्थान बनाने के लिए एक ऐसे रास्ते को अपनाया जो सबसे अलग था , इस बात का ना ख्याल करते हुए कि उसके सिर्फ इस बात से कितना बड़ा नुकसान समाज का हो जाएगा ,उसे सिर्फ इस बात की चिंता थी कि मेरे वक्तव्य दुनिया में स्वीकार कर लिया जाए ! उसे अटेंशन मिले और उसकी तरफ एक भीड़ डाइवर्ट हो जाए , जो सबसे अलग उसे समझे ! उसके जो दर्शन है वह सबसे अलग देखने को मिले, उसके जो दर्शन है वह सब कुछ स्वीकार करता है ,आप दारू पीते हैं तब भी कोई बात नहीं ,आप शराब पीते हैं तभी कोई बात नहीं है, आप चरित्रहीन हैं तब भी कोई बात नहीं है ,सब कुछ आजादी उनके फिलासफी में लोगों को मिलता है, और इसीलिए इस प्रकार की मानसिकता वाले जो लोग हैं उसको बहुत खूब पसंद करते हैं ! वैसे ही लोगों की संख्या उनके स्थान पर देखने को मिल जाएगा !
सवांदाता
मिथिलेश सिंह
नोएडा

Hæ, ég vildi vita verð þitt.