दुनिया की सबसे बड़ी समस्या मनुष्य के भीतरी विकास का अवनति की ओर होना है !

मनुष्य अपना विकास करते – करते होमोसेपियंस से मानव तक का सफर कर लिया ! विकास की ऊंचाइयों को छूते हुए वह सबकुछ सुलभ कर पाया है जो उसके जीवन को आसान बना सके ! गाड़ी ,बंगला , कार , और हवाई जहाज तक बना लिया , हजारों मील की यात्रा घंटो में तय करने की क्षमता वाली व्यस्था अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल कर बना ली ! सबकुछ वो किया गया मिलजुलकर जो जीवन को आसान बना सके ! सार्वजनिक तौर पर सरकार बनाई गई ,देश का निर्माण किया गया , जो लोगो की हितो का ख्याल कर सके उनको सुरक्षा दे सके !
आज दुनिया की सबसे बड़ी समस्या की बात की जाए तो वह आपस का वैचारिक मतभेद है ! आज हर मनुष्य को सोचने की आवश्यकता है ,अगर कोई भी विवाद के कारण दो लोग

एक दूसरे से लड़ने के लिए मजबूर हो जाये तो यह तय है कि उन्होंने अपना भीतरी विकास नही किया है !
मनुष्य का इस स्तर पर विकास होना चाहिए कि मस्तिष्क में युद्ध की स्थिति खत्म हो जाये, तभी माना जायेगा कि मनुष्य ने अपना विकास किया है ! लेकिन यह एक कल्पना मात्र है , सरकारों के द्वारा इस पर विशेष काम करने की आवश्यकता है, जिससे कि लोगो का मस्तिष्क इस स्तर पर विकास कर सके कि मस्तिष्क में युद्ध की स्थिति खत्म हो जाये ! व्यक्ति या सरकार अपना बाहरी विकास करने के लिए अपना आर्थिक विकास करने के लिए व्यापार करना शुरू किया ! और इस विकास की होड़ में व्यक्ति इस क्षेत्र में एक दूसरे से प्रतियोगिता करने लगा यही वो विचार है जहाँ से समाज और सरकार स्वार्थी होना शुरू हो गया ! अपना फायदा सर्वोपरि हो गया और इस कारण से वकिल अपने मूल चरित्र को छोड़कर लोगो की समस्याओं को सुलझाने की जगह उलझाने में अपनी भूमिका निभाने लगे , तभी तो लोग समस्यओं को सुलझाने के लिए वकीलों के पास जाएंगे तभी तो उनका स्वार्थ सिद्ध होगा ! सरकार की बात की जाए तो जब कोई सरकार का व्यापार हथियार बेचना हो जाये और सरकार स्वार्थी हो जाए तो उसका उद्देश्य अपनी कूटनीति से दो देशों को लड़वाना होगा ताकि उनका हथियार का बाजार कायम रहे, तभी उनका स्वार्थ सिद्ध होगा ! शराब का दुकानदार कभी नही चाहेगा कि सारे लोग साधु हो जाये , उसकी पहल हमेशा लोगो को शराबी बनाने की तरफ होगी ! यह बात सभी को समझने की आवश्यकता है , मनुष्य को लगता है कि वो अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु बम तक बना लिया है , लेकिन हम ये कह सकते सकते है कि मनुष्य ने खुद ही अपने विनाश की तैयारी की है !

संपादक

मिथिलेश सिंह

दिल्ली ( नोएडा )

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